भारत में सेलिब्रिटी कल्चर का बढ़ता प्रभाव और चिंतनशील समाज का पतन

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भारत में सेलिब्रिटी कल्चर का बढ़ता प्रभाव और चिंतनशील समाज का पतन

किसी भी राष्ट्र की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने समाज में किस प्रकार की प्राथमिकताओं को महत्व देता है। क्या वह ज्ञान, वैज्ञानिक सोच और नवाचार को प्रोत्साहित करता है, या फिर मनोरंजन, खेल और लोकप्रियता को अधिक महत्त्व देता है? यह कल्चर है! किसी समाज में दर्शन और विज्ञान का विकास होगा या नहीं, यह केवल संयोग नहीं होता, बल्कि वहां की संस्कृति इसे तय करती है। जिस समाज में चिंतन करने वालों को सम्मान मिलेगा, बोलने और सोचने की आजादी मिलेगी, वहां लोग चिंतक बनने की दिशा में अग्रसर होंगे। हमारे देश में इस समय सबसे बड़ा संकट यह है कि यहां सम्मान किसे मिलता है? सबसे अधिक फिल्मी सितारों को। क्यों मिलता है? एक्टर होना अच्छी बात है, बड़ी बात है, लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि उन्हें सबसे अधिक सम्मान मिले। भारत में लंबे समय से यह चर्चा का विषय रहा है कि यहां फिल्मी सितारों, क्रिकेटरों और पहलवानों को अत्यधिक सम्मान मिलता है, जबकि वैज्ञानिकों, शिक्षकों और दार्शनिकों को अपेक्षाकृत कम पहचान प्राप्त होती है। इस लेख में हम इसी मुद्दे पर गहराई से चर्चा करेंगे कि किस प्रकार समाज की संस्कृति तय करती है कि कौन से पेशे आकर्षण का केंद्र बनेंगे।

संस्कृति और समाज की प्राथमिकताएँ

किसी भी समाज की संरचना इस पर निर्भर करती है कि वह किन पेशों और व्यक्तित्वों को सबसे अधिक महत्त्व देता है। उदाहरण के लिए, प्राचीन ग्रीस में दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। अरस्तू, प्लेटो, सुकरात, हिप्पोक्रेट्स जैसे महान विचारक और वैज्ञानिक इसी कालखंड में पनपे। इनका प्रभाव आज भी पूरे विश्व में देखने को मिलता है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब एक समाज ज्ञान और चिंतन को सर्वोच्च स्थान देता है, तो वहाँ से महान विचारक और वैज्ञानिक जन्म लेते हैं।

वहीं, आधुनिक भारतीय समाज की बात करें, तो यहाँ मुख्य रूप से फिल्मी कलाकारों, क्रिकेट खिलाड़ियों और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों को अत्यधिक सम्मान प्राप्त होता है। स्कूल-कॉलेजों में भी अधिकतर छात्रों का सपना होता है कि वे एक क्रिकेटर बनें, बॉलीवुड में नाम कमाएँ या फिर एक सरकारी अफसर बनें।

वास्तविक योगदान और सम्मान का संतुलन

क्रिकेट खेलने वाले को इतना सम्मान क्यों मिलना चाहिए कि पूरा देश सब कुछ छोड़कर देख रहा है कि उसने चौका मारा या नहीं? यह सम्मान यदि डॉक्टर्स, वैज्ञानिकों और अध्यापकों को मिले तो देश की दिशा ही बदल जाए।

आईएएस या आईपीएस अधिकारी को इतना सम्मान क्यों मिलता है? सच्चाई यह है कि वे केवल एक जिले के मैनेजर होते हैं, जैसे किसी कंपनी में मैनेजर होता है। वे जिले को या मंत्रालय को मैनेज करते हैं, परंतु सभ्यता को आगे बढ़ाने में उनका योगदान सीमित होता है। जब तक समाज में चिंतक पैदा नहीं होंगे, नए विचार, विज्ञान और तकनीक विकसित नहीं होगी, तब तक समाज स्थिर ही रहेगा।

कल्चर और सम्मान की दिशा

समाज में किसे सम्मान मिलता है, यह कोई संयोग नहीं होता, बल्कि यह संस्कृति द्वारा निर्धारित किया जाता है। जिस देश में चिंतकों और वैज्ञानिकों का सम्मान होगा, वहीं पर नए वैज्ञानिक और दार्शनिक पैदा होंगे। लेकिन यदि सम्मान केवल कलेक्टर, एसपी, बिजनेसमैन, क्रिकेट खिलाड़ी या फिल्मी सितारों को मिलेगा, तो योग्य व्यक्ति का सपना भी वही बनने का होगा।

क्या एक अभिनेता होना इतनी बड़ी बात है कि उसे पूरे देश का प्यार और सम्मान मिले? एक डायलॉग लिखकर किसी अभिनेता को दे दिया जाता है और वह कैमरे के सामने पढ़ देता है—इसके लिए अत्यधिक तालियाँ बजती हैं। इसी तरह, क्रिकेट खिलाड़ियों को भी समाज में अत्यधिक महत्त्व मिलता है। पूरा देश क्रिकेट मैच को देखने के लिए अपना सारा काम रोक देता है, लेकिन क्या उतना ही सम्मान वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और शिक्षकों को मिलता है? अगर उन्हें भी उतना ही सम्मान मिले, तो देश की दिशा बदल सकती है।

प्रशासनिक सेवाएँ बनाम वैज्ञानिक योगदान

भारत में आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को भी अत्यधिक सम्मान दिया जाता है। लेकिन एक आईएएस अधिकारी का असल कार्य क्या होता है? वह एक जिले का प्रबंधन करता है, ठीक वैसे ही जैसे एक कंपनी का मैनेजर अपने विभाग को संभालता है। पुलिस अधिकारी राज्य की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं। यह एक महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन क्या इससे सभ्यता का विकास होता है? यदि हम दार्शनिक, वैज्ञानिकों और शिक्षकों को समान रूप से महत्त्व दें, तो वे समाज में नए विचार, नई तकनीक और नवाचार को जन्म देंगे, जिससे सभ्यता आगे बढ़ेगी।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण और ग्रीक सभ्यता

ग्रीस में केवल दार्शनिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक भी थे। अरस्तु पहला वैज्ञानिक था, हेरोडोटस को पहला इतिहासकार माना जाता है, और चिकित्सा विज्ञान में हिप्पोक्रेटस का नाम आज भी शपथ के रूप में लिया जाता है। 600 ईसा पूर्व से 400 ईस्वी तक, लगभग 1000 वर्षों में ग्रीस में एक साथ कई विद्वान पैदा हुए। कुछ विशेष परिस्थितियां अवश्य थीं, जिनकी वजह से यह संभव हुआ।

भारत में भी कभी यही स्थिति थी, लेकिन अब ज्ञानी व्यक्ति का सम्मान कम होता जा रहा है। इसके विपरीत, अच्छे गायक, कॉमेडियन और अभिनेताओं को अधिक सम्मान मिलता है। जब समाज में ज्ञान का सम्मान कम होगा, तो ज्ञानी लोग भी कम होते जाएंगे।

शिक्षकों और वैज्ञानिकों को सम्मान देने की आवश्यकता

अगर हमें समाज को बेहतर बनाना है, तो हमें वैज्ञानिकों, शिक्षकों, दार्शनिक और शोधकर्ताओं को भी वही सम्मान देना होगा, जो आज फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों को मिलता है। जब एक बच्चा देखेगा कि एक वैज्ञानिक को वही मान्यता प्राप्त है जो एक क्रिकेटर को मिलती है, तो निश्चित रूप से वह विज्ञान और शोध में रुचि लेगा।

इसके लिए हमें शिक्षा प्रणाली में सुधार करने की आवश्यकता है। छात्रों को सिर्फ सिलेबस तक सीमित न रखते हुए उन्हें अनुसंधान और नवाचार के प्रति प्रेरित करना होगा। इसके अलावा, मीडिया और सरकार को भी इस दिशा में कार्य करना चाहिए ताकि समाज में वैज्ञानिकों और शिक्षकों को उचित सम्मान प्राप्त हो।

निष्कर्ष

समाज की प्राथमिकताएँ ही यह तय करती हैं कि भविष्य में कौन से पेशे विकसित होंगे और कौन से लोग प्रेरणास्रोत बनेंगे। यदि भारत को एक वैज्ञानिक और चिंतनशील राष्ट्र बनाना है, तो हमें अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वैज्ञानिकों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं को वही मान-सम्मान मिले, जो एक फिल्मी सितारे या क्रिकेटर को मिलता है। तभी हम एक विकसित और ज्ञान-आधारित समाज का निर्माण कर सकते हैं।

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